दो फरवरी से बिहार विधानसभा का बजट सत्र शुरू होने जा रहा है, लेकिन उससे पहले कांग्रेस के भीतर नेतृत्व (Bihar Congress Leadership) को लेकर मंथन तेज हो गया है। शीतकालीन सत्र समाप्त हो चुका है, पर अब तक कांग्रेस अपने विधायक दल का नेता तय नहीं कर पाई है। यह स्थिति न केवल संगठनात्मक कमजोरी को उजागर करती है, बल्कि सदन में विपक्ष की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े कर रही है। पिछली बार विधायक दल के नेता रहे शकील अहमद खान चुनाव हार चुके हैं और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम भी विधानसभा नहीं पहुंच सके। ऐसे में पार्टी के सामने नेतृत्व का संकट और गहरा गया है।
बिहार विधानसभा में कांग्रेस के महज छह विधायक बचे हैं। इन्हीं छह में से किसी एक को विधायक दल का नेता चुना जाना है। दिसंबर में ही इस संबंध में पार्टी आलाकमान को पत्र भेजा जा चुका है, लेकिन अब तक अंतिम मुहर नहीं लग पाई। पार्टी सूत्रों के अनुसार, 23 जनवरी को सभी विधायक और वरिष्ठ नेता दिल्ली बुलाए गए हैं, जहां आलाकमान इस मुद्दे पर फैसला ले सकती है। वरिष्ठ नेताओं का दावा है कि दो से तीन दिन के भीतर तस्वीर साफ हो जाएगी, लेकिन बजट सत्र की तारीख नजदीक आने के कारण दबाव लगातार बढ़ रहा है।
नेतृत्व चयन को जटिल बनाने वाला सबसे बड़ा कारण विधायकों का अनुभव और सामाजिक-राजनीतिक संतुलन है। छह में से तीन विधायक वाल्मीकिनगर से सुरेंद्र प्रसाद, चनपटिया से अभिषेक रंजन और फारबिसगंज से मनोज विश्वास पहली बार विधानसभा पहुंचे हैं। उत्साह और ऊर्जा जरूर है, लेकिन विधायी प्रक्रिया का अनुभव सीमित माना जा रहा है। किशनगंज के विधायक कमरुल होदा अनुभवी जरूर हैं, पर वे एआईएमआईएम से कांग्रेस में आए हैं, जिससे पार्टी के भीतर उन्हें शीर्ष जिम्मेदारी सौंपने को लेकर हिचक बनी हुई है।
अबिदुर्र रहमान तीसरी बार विधायक बने हैं और सदन की कार्यप्रणाली से भली-भांति परिचित हैं। हालांकि, स्वास्थ्य कारणों से उनकी सक्रियता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। वहीं, सबसे अनुभवी चेहरा पूर्व आईपीएस और चार बार के विधायक मनोहर प्रसाद सिंह का है, लेकिन आदिवासी समुदाय से आने के कारण कुछ नेताओं का मानना है कि मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में उनका नाम पूरी तरह फिट नहीं बैठता। यही वजह है कि पार्टी के भीतर उनके समर्थन और विरोध दोनों स्वर सुनाई दे रहे हैं।
कांग्रेस सूत्रों की मानें तो असली मुकाबला दो नामों के बीच सिमट गया है—अनुभवी नेता आबिदुर्र रहमान और युवा विधायक अभिषेक रंजन। एक धड़ा मानता है कि मुस्लिम वोट बैंक पर मजबूत पकड़ और सदन का अनुभव आबिदुर्र रहमान को स्वाभाविक दावेदार बनाता है। दूसरा धड़ा युवाओं को आगे लाने की पैरवी कर रहा है और उसका तर्क है कि अभिषेक रंजन नई ऊर्जा के साथ सदन में आक्रामक और तथ्यपूर्ण तरीके से मुद्दे उठा सकते हैं। हालांकि, अनुभव की कमी को लेकर उनके समर्थक भी यह स्वीकार करते हैं कि शुरुआती दौर में उन्हें मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी।
इधर, पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं और संभावित टूट-फूट की अटकलों पर प्रदेश अध्यक्ष ने सख्त प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि इस तरह की अफवाहों में कोई दम नहीं है और कांग्रेस के सभी छह विधायक पूरी प्रतिबद्धता के साथ पार्टी के साथ खड़े हैं। ‘खेला-खेला’ की बातें राजनीतिक शगल बन चुकी हैं। उनके मुताबिक असली खेल वही है, जिससे खिलाड़ी देश का नाम रोशन करते हैं, बाकी सब मदारी का खेल है। प्रदेश अध्यक्ष ने यह भी स्पष्ट किया कि खरमास खत्म हो चुका है और कांग्रेस अब जिम्मेदार व धारदार विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।






















