Bihar Politics: बिहार की राजनीति में इन दिनों एक पुराना लेकिन असरदार नाम फिर से सुर्खियों में है। शिवानंद तिवारी, जिन्हें लालू प्रसाद यादव स्नेह से ‘बाबा’ कहते हैं, इस वक्त पूरे सियासी तेवर में नजर आ रहे हैं। उम्र और सक्रिय राजनीति से दूरी के बावजूद बाबा की नजर हर राजनीतिक हलचल पर है और उनकी जुबान पहले से ज्यादा तीखी दिख रही है। मकर संक्रांति के मौके पर हुई भोज की राजनीति के बीच बाबा का एक फेसबुक पोस्ट राजद के भीतर हलचल का बड़ा कारण बन गया है।
दरअसल, बिहार की राजनीति में दही-चूड़ा भोज केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन और संगठनात्मक एकजुटता का प्रतीक रहा है। राबड़ी आवास से लेकर बड़े नेताओं के घर तक, यह भोज हमेशा सियासी संदेश देता रहा है। इस बार मकर संक्रांति पर तेज प्रताप यादव के आवास पर सजी महफिल ने सबका ध्यान खींचा। लालू प्रसाद यादव खुद वहां पहुंचे, पार्टी के कई नेता मौजूद रहे और माहौल पूरी तरह राजनीतिक दिखा। लेकिन इस चमक के बीच तेजस्वी यादव की गैरमौजूदगी ने सवालों की लकीर खींच दी।
यही वह बिंदु है, जहां से शिवानंद तिवारी का गुस्सा फूट पड़ा। सोशल मीडिया पर लिखे अपने लंबे पोस्ट में उन्होंने तेजस्वी यादव की चुप्पी और निष्क्रियता पर खुलकर सवाल उठाए। बाबा का कहना है कि चुनावी हार के बाद जब कार्यकर्ताओं को सबसे ज्यादा संबल और दिशा की जरूरत थी, उस वक्त पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा ही मैदान से गायब नजर आ रहा है। उनके शब्दों में तेज प्रताप यादव पूरी तरह सियासी रंग में डूबे दिखे, जबकि तेजस्वी यादव कहीं नजर नहीं आए।
शिवानंद तिवारी ने याद दिलाया कि एक समय था जब मकर संक्रांति पर राबड़ी आवास में उमड़ने वाली भीड़ सिर्फ दही-चूड़ा खाने नहीं आती थी। वह नेताओं को देखने, उनसे मिलने, चरण स्पर्श करने और नई ऊर्जा लेकर अपने इलाके में लौटने आती थी। बाबा के मुताबिक, आज उसी ऊर्जा की सबसे ज्यादा जरूरत थी। चुनावी नतीजों से हताश कार्यकर्ताओं को भरोसा चाहिए था कि नेतृत्व उनके साथ खड़ा है। लेकिन जब नेता ही हतोत्साहित दिखे, तो कार्यकर्ताओं को कौन संभालेगा।
बाबा की टिप्पणी यहीं नहीं रुकी। उन्होंने तेजस्वी यादव की उस छवि पर भी तंज कसा, जिसे वे ‘देर से जागने वाला नेतृत्व’ कहते हैं। तेज प्रताप यादव ने खुद राबड़ी आवास जाकर परिवार समेत भोज का न्योता दिया, कार्यक्रम की तैयारी की और राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई। इसके उलट तेजस्वी यादव का न पहुंचना, बाबा की नजर में सिर्फ व्यस्तता नहीं बल्कि गंभीरता की कमी का संकेत है।
इस पूरे मामले में शिवानंद तिवारी ने तेजस्वी के आसपास मौजूद सलाहकारों को भी कटघरे में खड़ा किया है। बाबा ने तीखे शब्दों में उन लोगों को याद किया, जिन्होंने कभी तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद की शपथ की तारीख तक तय करवा दी थी और तेज प्रताप को रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बताया था। बाबा का सवाल है कि आज जब पार्टी को दिशा देने की जरूरत है, तब न तेजस्वी दिख रहे हैं और न ही वे सलाहकार, जो कभी भविष्य की बड़ी-बड़ी इबारतें लिख रहे थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवानंद तिवारी का यह हमला सिर्फ व्यक्तिगत नाराजगी नहीं है। यह राजद के भीतर चल रहे उस मंथन का संकेत है, जो चुनावी हार के बाद और तेज हो गया है। एक तरफ तेजस्वी यादव रणनीतिक चुप्पी के जरिए भविष्य की तैयारी में जुटे बताए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ तेज प्रताप यादव की सक्रियता पार्टी के भीतर नए सवाल खड़े कर रही है। बाबा का बयान इसी अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक मंच पर ले आया है।
तेज प्रताप यादव की तारीफ करते हुए शिवानंद तिवारी ने साफ संदेश दिया है कि राजनीति में दिखाई देना भी उतना ही जरूरी है, जितना रणनीति बनाना। बिहार की सियासत में प्रतीक, परंपरा और मौजूदगी का अपना महत्व है। दही-चूड़ा भोज जैसे आयोजनों को नजरअंदाज करना कार्यकर्ताओं के मनोबल पर सीधा असर डाल सकता है।






















