गया टाउन विधानसभा क्षेत्र (Gaya Town Election 2025), बिहार की राजनीति का वह अहम केंद्र है, जहां सियासी समीकरण हर चुनाव में नया मोड़ लेते हैं। यह सीट न केवल गया लोकसभा क्षेत्र की सबसे चर्चित सीटों में से एक है, बल्कि यहां के मतदाता हर बार बदलाव की हवा भी पैदा करते हैं। 1957 में अस्तित्व में आई यह सीट अब तक 18 विधानसभा चुनाव और दो उपचुनाव देख चुकी है, जिनमें कई दलों ने बारी-बारी से सत्ता का स्वाद चखा।
चुनावी इतिहास
राजनीतिक रूप से देखा जाए तो गया टाउन विधानसभा सीट ने बिहार की राजनीति में कई बड़े नेताओं को जन्म दिया है। कांग्रेस से लेकर भाकपा, भाजपा, राजद और लोजपा तक — सभी ने इस सीट पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की। अब तक कांग्रेस 2 बार, भाकपा 3 बार, भाजपा 3 बार (जिसमें एक बार जनसंघ के रूप में), राजद 5 बार और अन्य दल एक-एक बार जीत चुके हैं।
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लेकिन पिछले तीन दशकों में इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने लगभग वर्चस्व कायम कर लिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री प्रेम कुमार ने 1990 से 2020 तक लगातार आठ बार यहां से जीत दर्ज की। उनके नेतृत्व में गया टाउन बीजेपी का अभेद किला बन गया। हालांकि, अब सवाल यह है कि क्या यह गढ़ बरकरार रहेगा या कांग्रेस और महागठबंधन फिर से कोई नई कहानी लिखेंगे।
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2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के प्रेम कुमार ने कांग्रेस उम्मीदवार अखुरी ओंकार नाथ को हराया था। लेकिन उस चुनाव ने यह भी संकेत दिया कि कांग्रेस का वोट बैंक अब पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि एक संभावित पुनरुत्थान की दिशा में है। कांग्रेस को इस सीट पर आखिरी जीत 1985 में मिली थी, जब उसका संगठनात्मक ढांचा और स्थानीय जनसंपर्क मजबूत था।
जातीय समीकरण
इस सीट पर जातीय समीकरण भी अहम भूमिका निभाते हैं। कायस्थ समुदाय के मतदाता यहां निर्णायक माने जाते हैं, जबकि शहरी मतदाताओं के बीच विकास, रोजगार, सड़क और जल-जमाव जैसे मुद्दे प्रमुख रहते हैं। गया टाउन का मतदाता जातीयता के साथ-साथ स्थानीय विकास को भी तवज्जो देता है, जो इसे अन्य सीटों से अलग बनाता है।






















