[Team insider] चार दशक तक देश में विज्ञापन की दुनिया में अपनी मजबूत दखल रखने वाले देश की ख्यात एड एजेंसी ‘उल्का’ के क्रियेटिव डायरेक्टर रहे सुबोध पोद्दार ने पेंटिंग और स्कल्पचर की दुनिया में भी अपना जलवा बिखेरा है। आधा दर्जन देशों में अपने हुनर की गंध बिखेरने के बाद बुद्ध के प्रति समर्पित हो गये हैं। इसी साल फरवरी माह में उनकी पुस्तक ‘ धम्म पथ पर राहुला’ आई है।
बुद्ध को अलग नजरिये से देखा है। हाल ही एक कार्यक्रम के सिलसिले में रांची आये थे। सुबोध पोद्दार के हुनर को जानना भी कम दिलचस्प नहीं है। दो सौ से अधिक विज्ञापनों को निर्देशित कर चुके सुबोध अपने उपन्यास पर अपने ही निर्देशन में फिल्म बनाना चाहते हैं। यह उनका सपना भी है। बौद्ध सूत्रों पर आधारित यह उपन्यास कुछ इस तरह है…
गौतम बुद्ध सात दिन कपिलवस्तु में रहे
राहुला, गौतम बुद्ध का सात वर्ष का बेटा पिता के वापस लौटने की प्रतीक्षा में अधीर था। नन्हे राहुला ने सुन रखा था कि वापस आकर राजकुमार सिद्धार्थ कपिलवस्तु पर राज करेंगे और उसका राज्याभिषेख भी करेंगे। परन्तु नगर की गलियों में उसने जब पिता को भिक्षु वेश में देखा तब उसे बढ़ा अचरज हुआ। उसके मन के उथल-पुथल को अम्मा यशोधरा ने पिता के परिचय में अद्भुत श्लोक कहकर शान्त किया। गौतम बुद्ध सात दिन कपिलवस्तु में रहे। लोगों को धम्म का महत्व समझाते रहे।
नये शिष्यों को दीक्षा दी और फिर चल दिये धम्म प्रचार के पथ पर। उन सात दिनों में राहुला ने पिता गौतम के प्रवचन सुने। प्रवचनों का और उस दौरान आस पास की अलौकिक घटनाओं का राहुला पर ऐसा असर पड़ा कि उसकी निगाहों में वो भिक्षु देखते ही देखते राजाओं के राजा बन गये। सातवें दिन राहुला भी सब कुछ छोड़-छाड़ के, सम्मोहित सा पिता के साथ चल दिया। इसी विषय वस्तु के आस पास रची गयी है ये काहानी जिसे रोचक बनाते हैं इसके पात्र।
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महाराज शुद्धोधन, गादी गौतमी, यशोधरा, राज प्रासाद के कर्मचारी और सारथी चन्ना कहानी में भावुकता का रंग चढ़ाते हैं। जहां आनंद का चरित्र प्रेम से ओतक्रोत है वहीं देवदत्त खलनायक से कम नहीं है। महाराज सपने देख रहे थे सिद्धार्थ के कन्धों पर राज पाट का भार सौंपने का, वहीं गौतमी नें उसे अपने स्नेह में बांध कर रखने की ठान ली थी।
इनके विपरीत यशोधरा ने अपने पति की आंखों में वैराग्य को पहचान लिया था। वो बुद्ध के पथ में बाधा नहीं बनना चाहती थी। वो मौन धरे पिता पुत्र को दूर जाते हुए देखती रही। जिस बालक को ज्ञान के पथ का बाधा घोषित करके सिद्धार्थ पलायन कर गये थे उसी बालक को आज अपने साथ लेकर चले गये। उपन्यास लेखन के सिलसिले में उन्होंने बोधगया में भी कई दिन गुजारे और बुद्ध की महिमा को महसूस किया।
यादगार विज्ञापन
पोद्दार विज्ञापन की दुनिया में चालीस साल रहे। दो सौ से ज्यादा एड फिल्में लिखीं, निर्देशित किया। अमूल द टेस्ट ऑफ इंडिया, गोदरेप कप बोर्डस, नेरोलेक पेंट, संतूर साबुन आदि चर्चित विज्ञापन कंपेन में रहे। अमूल द टेस्ट ऑफ इंडिया में भागीदार रहे, जिंगल जरा सी हंसी दुलार जरा सा इन्हीं का लिखित और निर्देशित है।
हल्दी और चंदन के गुण समाये संतूर, जीवन को कुछ और सजाये.. संतूर यह लाइन आज भी लोगों के जेहन में है। इसका कंसेप्ट जिंगल, स्क्रिप्ट डायरेक्शन इन्हीं का था। जब घर की रौनक बढ़ानी हो, नेरोलेक पेंट के विज्ञापन का लिरिक भी इन्हीं का था। इनका ही कंपने था जो अभी भी चल रहा है।
बचपन से बनाता था मूर्तियां
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सुबोध पोद्दार कहते हैं कि जब बच्चा था मध्य प्रदेश के कटनी के सरकारी स्कूल में पढ़ता था। कोई पांच-छह साल का था, स्कूल से लोटते समय गांव के खेतों से मिटि्टयां ले आता और मूर्तियां बनाता था। दसवीं ग्यारहवीं में आने तक स्कूल में मेरी बनाई मूर्तियां स्थापित होतीं पूजा होता। वह बचपन की बात, जब कॉलेज में आ गया जेजे स्कूल, अप्लायड आर्ट में। मैंने विज्ञापन सीख लिया और विज्ञापन की दुनिया में प्रवेश कर गया फिर मौका नहीं मिला।
और विज्ञापनों के लिए लिखने लगा
मध्य प्रदेश से था, वहां की मेरी जो हिंदी थी मुंबई आने पर लगा अंधों में काना राजा हो गया। हमारे एक क्लाइंट संभ्रांत परिवार से आते थे और हिंदी में बात करना पसंद करते थे। मुंबई की एड एजेंसियों में होते थे अंग्रेज जो अंग्रेजी में बात करते थे। मुझे ले गये कि इस क्लाइंट की मीटिंग है, हिंदी में बात कर उन्हें अच्छा लगेगा। उस मीटिंग में एक प्रोडक्ट था झंडू केसरी जीवन का था।
उसमें आंवला, केसर मधु आदि जो कड़ाके की कड़ाके की सर्दियों में 60 साल से ज्यादा के उम्र के लोगों में गर्मी लाता है। क्लाइंट को थोड़ा चुलबुलापन चाहिए था और वे सॉफिस्टिकेटेड से संकोच में सेक्स से जुड़े शब्द इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। मैनें फटाक से उन्हें लाइन दे दी, कहा साठ साल के बूढ़े या साठ साल के जवान। ये सुन वे बड़ा खुश हुए, मेरे लिये वह साधारण हिंदी थी।
विज्ञापन एजेंसी उल्का में मैं क्रियेटिव डायरेक्टर था
संभवत: चालीस साल से वह लाइन अभी भी चल रही है। यह मेरा क्लेरियन एडवर्टाइजिंग में काम का दौर था। झंडू पंचारिष्ठ और झंडू केसरी और झंडू वाम था उनके पास। उस समय मैं जूनियर था, उसके बाद बाद से मैंने विज्ञापन के लिए लिखना शुरू किया। इस सोच के साथ कि साधारण सी भाषा लोगों को छू जाती है। मेरे एमडी ने कहा कि आप लिखते बढ़िया हैं और ड्राइंग भी बेहतर करते हैं फिल्म बनाना शुरू करें। तब मैं फिल्म डायरेक्ट करने लगा। विज्ञापन एजेंसी उल्का में मैं क्रियेटिव डायरेक्टर था।
अभी गौतम बुद्ध पर मूर्तियां बना रहा हूं
जब किसी प्रोडक्ट के लिए एड बनाते हैं तो दूसरे के दिलों में जगह बनाने की कोशिश होती है। पेंटिंग, स्कल्पचर निजी बात है जो आज मैं महसूस कर रहा हूं आप तक पहुंचे। रिटायरमेंट के बाद कल्चर पर सिरामिक, स्टोन वेयर पर करता हूं, प्राचीन शुरू की थीम मोहन जोदाड़ो की थी। सेरामिक और ब्रांज में एक दशक पहले। नृत्य करती हुई लड़की की। अभी गौतम बुद्ध पर मूर्तियां बना रहा हूं। प्राचीन लुक में।
बहुत तेज पेंटिंग
मैं जब विज्ञापन में था तो मेरी कला यानी पेंटिंग के लिए समय नहीं मिलता था। दफ्तर के करीब डांस थियेटर में जा अंधेरे में ही डांसर की तस्वीर उतारता था। रास्ते में सफर करते हुए भी तस्वीरें बनाता। इस प्रक्रिया में बड़ी तेजी से ग्राफिक्स बनाने लगा। बिरजू महाराज के डांस स्कूल भी जाने लगा। दक्षता के लिए चार साल तक ओडिशी डांस भी सीखा। देश के विभिन्न हिस्सों में डांस स्कूल में भ्रमण के दौरान जाता। एक तरफ डांस चलता रहता और दूसरी तरफ कागज पर मेरा ब्रश कलम कागज पर नाचता रहता।
भारत के लगभग तमाम बड़े नृत्यांगनाओं को पेपर पर उतारा है। इटली की डांसर को भी। हर डांसर का बडी लैंग्वेज अलग-अलग होता है को कैप्चर करने में मुझे मजा आने लगा। कम से कम लाइनों में ज्यादा से ज्यादा भाव परोसने की कोशिश रही। कोहबर को लेकर कैंपेन करने का भी इरादा है ताकि हर शादी में हर घर में यह कला पहुंच जाये। राजस्थान, बंगाल, कर्नाटक से लेकर दूसरे देशों तक।
डांस स्केच
मल्लिका साराभाई के स्कूल में एक इटालियन डांसर मिली। एंथन, जो भरत नाट्यम में पीएचडी कर रही थी। उन्हें मेरा काम पसंद आया। वो नाचती थीं मैं कागज पर रेखा चित्र उतारता। उस रेखा चित्र को चार कैमरे में कैप्चर कर डांसर के पीछे स्क्रिन पर प्रोजेक्ट किया जाता लगातार। इटली में नौ बार , पेरिस, मोरक्को में भी यह शो मैने किया है। ड्रामा की तरह री टेक का कोई स्कोप नहीं।
राहुला की पैदाइश
जब इटली में शो कर रहा था। किसी से सुना कि झोपड़पट्टी से आता है इतना बढ़िया कैसे पेंट करता है। स्लम डॉग मिलेनियर फिल्म आई थी। दुनिया ने देखी मगर भारत को स्लम बताया था। यही विदेशियों के मन में घर कर गया। उस दिन से मैंने तय किया कि मैं कोई स्क्रिप्ट लिखूंगा देश का अलग चेहरा पेश करने के लिए। कई काम किये मगर राहुला उसमें सबसे बेहतर लगा। बुध के बारे में बहुत से लोगों ने सेट पैटर्न पर लिखा है मुझे कुछ अलग उस मनुष्य के बारे में लिखना था। 2013-14 की बात है।
श्रीलंका में मैं काम कर रहा था, नरसिंह गाथा किताब हाथ लगी, एक सन्यासी के सौजन्य से। बुध सिंह की तरह गरजते थे जिसे लोग आज भी सुनते हैं। तो मैं राहुला बन उसकी नजर से देखने लगा। बच्चे की दृष्टि से मंथन करने लगा और किताब की शक्ल अब आपके सामने है। करीब सवा दो सौ पेज की है। इलिस्ट्रेशन के साथ। डायलॉग लिखवाने मैं रांची आउंगा। जो प्राचीन भाषा में लिख सके। इस फिल्म को लिखने के लिए तो मैं आकर बस जाऊं किसी लेखक के साथ।