बिहार के अररिया जिले की जोकीहाट विधानसभा सीट, निर्वाचन क्षेत्र संख्या 50 (Jokihat Assembly Election) सीमांचल की राजनीति में हमेशा से सुर्खियों में रही है। इस सीट पर पहली बार 1967 में चुनाव हुआ था और तब PSP के नजामुद्दीन विजयी हुए थे। लेकिन 1969 से लेकर अब तक यह सीट तस्लीमुद्दीन परिवार का गढ़ बनी रही है। सीमांचल के गांधी कहे जाने वाले तस्लीमुद्दीन ने यहां से राजनीति की शुरुआत की और इसके बाद उनके परिवार ने लगभग हर चुनाव में दबदबा कायम रखा।
चुनावी इतिहास
जोकीहाट की राजनीति में तस्लीमुद्दीन परिवार का प्रभुत्व इतना गहरा है कि अब तक हुए 14 चुनावों में 9 बार उनके ही परिवार के सदस्य विजयी रहे हैं। 2018 के उपचुनाव में तस्लीमुद्दीन के छोटे बेटे शाहनवाज आलम विधायक बने। वहीं, 2015 में जेडीयू के सरफराज आलम ने जीत दर्ज की थी। दिलचस्प बात यह है कि तस्लीमुद्दीन के निधन के बाद 2017 के लोकसभा उपचुनाव में सरफराज आलम सांसद बने, तो विधानसभा उपचुनाव में छोटे भाई शाहनवाज आलम ने आरजेडी के टिकट पर जीत हासिल की।
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2020 का चुनाव हालांकि पारिवारिक राजनीति के भीतर की जंग में तब्दील हो गया। इस बार AIMIM के टिकट पर लड़ते हुए शाहनवाज आलम ने अपने ही भाई और RJD प्रत्याशी सरफराज आलम को 7,383 वोटों के अंतर से हराया। शाहनवाज को 59,596 वोट मिले जबकि सरफराज को 52,213 वोट हासिल हुए। इससे जोकीहाट की राजनीति में नया समीकरण सामने आया, जहां परिवार के भीतर की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने माहौल को और पेचीदा बना दिया।
जातीय समीकरण
अगर जातीय समीकरण की बात करें तो जोकीहाट पूरी तरह मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है। यहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 70% है, और यही कारण है कि अब तक किसी गैर मुस्लिम प्रत्याशी को जीत दर्ज करने का मौका नहीं मिला। कुल मतदाताओं की संख्या 2,86,682 है, जिनमें 1,51,710 पुरुष और 1,35,107 महिला मतदाता शामिल हैं। इस क्षेत्र की एक बड़ी समस्या हर साल आने वाली बाढ़ है, जिससे प्रखंड के दक्षिणी हिस्से की दर्जनभर पंचायतें प्रभावित होती हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए पलायन करने को मजबूर हैं।
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जोकीहाट सीट का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि यह तस्लीमुद्दीन परिवार का गढ़ है, बल्कि इसलिए भी कि यह सीमांचल की राजनीति की दिशा तय करती है। यहां के नतीजे हमेशा बड़े राजनीतिक संदेश देते रहे हैं। 2025 के चुनाव में सवाल यह होगा कि क्या तस्लीमुद्दीन परिवार अपनी सियासी पकड़ बनाए रख पाएगा, या AIMIM और अन्य दल नए समीकरण गढ़ने में कामयाब होंगे।






















