संसद में जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा का संबोधन केवल एक योजना के समर्थन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने ग्रामीण भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की एक व्यापक रूपरेखा सामने रखी। उन्होंने एक जिला एक उत्पाद (ODOP Scheme) योजना को ‘मेरा गाँव मेरी धरोहर’ (MGMD) कार्यक्रम के साथ जोड़ने पर बल देते हुए इसे भारत के विकास मॉडल के लिए एक निर्णायक मोड़ बताया।
अपने विचार रखते हुए संजय कुमार झा ने कहा कि ओडीओपी और एमजीएमडी के बीच तालमेल की संभावनाएं बेहद व्यापक हैं। यह केवल स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूती देने का माध्यम नहीं बनेगा, बल्कि भारत की बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर सम्मानजनक पहचान दिलाने में भी अहम भूमिका निभाएगा। उनके अनुसार, विकास की भारतीय अवधारणा तब और मजबूत होगी जब आर्थिक प्रगति के साथ सांस्कृतिक संरक्षण को भी समान महत्व दिया जाएगा।
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उन्होंने स्पष्ट किया कि उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग द्वारा परिकल्पित एक जिला एक उत्पाद योजना स्थानीय विशिष्टताओं को वैश्विक ब्रांड में बदलने की एक सुव्यवस्थित रणनीति है। इस पहल के तहत कारीगरों, किसानों और सूक्ष्म व लघु उद्यमों को न केवल वित्तीय और तकनीकी सहायता दी जा रही है, बल्कि उनकी पारंपरिक पहचान को भी संरक्षित किया जा रहा है। ओडीओपी उत्पादों को व्यापार मेलों, अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और कूटनीतिक माध्यमों से वैश्विक बाजार तक पहुंच दी जा रही है, जिससे भारत के निर्यात को नई गति और ब्रांड वैल्यू को नई पहचान मिल रही है।
संजय झा ने विशेष रूप से बिहार का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य ओडीओपी ढांचे के तहत अपार संभावनाओं के साथ उभर कर सामने आया है। बिहार के प्रत्येक जिले ने रणनीतिक रूप से ऐसे उत्पादों की पहचान की है जो निर्यातोन्मुख होने के साथ स्थानीय पहचान का भी प्रतीक हैं। सिवान के फार्मास्यूटिकल उत्पाद, समस्तीपुर के बांस आधारित उत्पाद, मुजफ्फरपुर की विश्वप्रसिद्ध शाही लीची, भागलपुर का कतरनी चावल और रेशम, तथा किशनगंज की चाय जैसे उत्पाद न केवल आर्थिक सशक्तता का आधार हैं, बल्कि क्षेत्रीय गौरव और परंपरा का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि ओडीओपी भले ही अपने आप में जिला-स्तरीय अर्थव्यवस्थाओं को बदलने की क्षमता रखती हो, लेकिन ‘मेरा गाँव मेरी धरोहर’ कार्यक्रम के साथ इसका समन्वय इस बदलाव में एक गहरा सांस्कृतिक आयाम जोड़ सकता है। एमजीएमडी के अंतर्गत गांवों की सांस्कृतिक पारिस्थितिकी का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जा रहा है, जिसमें इतिहास, लोककथाएं, अनुष्ठान, परंपराएं और स्थानीय पहचान शामिल हैं। यदि इन तत्वों को ओडीओपी उत्पादों की ब्रांडिंग से जोड़ा जाए, तो हर उत्पाद केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ी एक जीवंत कहानी बन सकता है।
इस तालमेल का परिणाम यह होगा कि ओडीओपी के तहत होने वाला हर निर्यात एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में प्रस्तुत किया जा सकेगा। एमजीएमडी के तहत संकलित ग्राम कथाएं, लोक परंपराएं और प्रमाणित पारंपरिक ज्ञान, ओडीओपी उत्पादों के प्रचार का सांस्कृतिक आधार बन सकते हैं। इसके साथ ही, जिन गांवों को विशिष्ट शिल्प, कला रूपों या अनुष्ठानों के लिए पहचाना गया है, उन्हें औपचारिक रूप से ओडीओपी–हेरिटेज स्पेस के रूप में विकसित किया जा सकता है।
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ऐसे हेरिटेज स्पेस में निर्यातोन्मुख उत्पादन इकाइयों के साथ सांस्कृतिक प्रदर्शनी स्थल और सामुदायिक संग्रहालय स्थापित किए जा सकते हैं। इससे एक ओर स्थानीय लोगों के लिए स्थायी आजीविका के अवसर सृजित होंगे, वहीं दूसरी ओर भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा। यह मॉडल सतत विकास की अवधारणा को मजबूत करते हुए भारत की सभ्यतागत कथा को वैश्विक मंच पर और अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करेगा।
अपने संबोधन के अंत में संजय कुमार झा ने सरकार से आग्रह किया कि वह ओडीओपी और ‘मेरा गाँव मेरी धरोहर’ के इस संभावित तालमेल पर गंभीरता से विचार करे। उनके अनुसार, यह पहल आर्थिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करती है और दुनिया के सामने विकास का एक विशिष्ट भारतीय मॉडल पेश कर सकती है।



















