पूर्णिया से निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव (Pappu Yadav News) की कानूनी मुश्किलें एक बार फिर सुर्खियों में हैं। पटना की विशेष एमपी-एमएलए अदालत ने उनके खिलाफ कुर्की-जब्ती का आदेश जारी कर दिया है, जिससे बिहार की सियासत में नई हलचल तेज हो गई है। यह कार्रवाई विशेष न्यायाधीश प्रवीण कुमार मालवीय की अदालत ने लंबे समय से कोर्ट में पेश न होने को गंभीरता से लेते हुए की है। पप्पू यादव के साथ-साथ इस मामले में नामजद अन्य आरोपी शैलेंद्र प्रसाद और चंद्र नारायण प्रसाद भी अदालत की सख्ती की जद में आ गए हैं।
अदालत के अनुसार यह कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के तमाम अवसरों के बाद लिया गया अंतिम सख्त फैसला है। इससे पहले आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए थे और बाद में उनके ठिकानों पर इश्तेहार भी चिपकाने का आदेश दिया गया, लेकिन इसके बावजूद किसी भी आरोपी की ओर से न तो अदालत में हाजिरी दी गई और न ही कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने आई। अदालत ने इसे कानून की अवहेलना मानते हुए कुर्की-जब्ती की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया है।
इस पूरे विवाद की जड़ करीब 31 साल पुरानी है। वर्ष 1995 में पटना के गर्दनीबाग थाना में प्राथमिकी संख्या 552/1995 दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ता विनोद बिहारी लाल का आरोप है कि उनका मकान धोखे से किराए पर लिया गया था। किराएदार ने जानबूझकर तथ्य छिपाए और उस मकान का इस्तेमाल सांसद कार्यालय के रूप में करने लगा। जब मकान मालिक को इस बात की जानकारी हुई और उन्होंने विरोध जताया, तो आरोप है कि उन्हें धमकाया गया और डराने की कोशिश की गई। इसी शिकायत के आधार पर मामला दर्ज हुआ और न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ती रही।
बीते तीन दशकों में यह केस कई बार अदालत के सामने आया, लेकिन बार-बार तारीखों के बावजूद आरोपियों की गैरहाजिरी ने मामले को और जटिल बना दिया। अदालत का मानना है कि कानून सबके लिए बराबर है, चाहे वह आम नागरिक हो या जनप्रतिनिधि। इसी सिद्धांत के तहत अब कुर्की-जब्ती को अंतिम विकल्प के रूप में अपनाया गया है। अगर तय समय सीमा के भीतर आरोपी आत्मसमर्पण नहीं करते हैं, तो पुलिस को उनकी संपत्ति जब्त करने का अधिकार मिल जाएगा।
इस मामले की अगली सुनवाई 7 फरवरी 2026 को निर्धारित की गई है। अदालत ने संकेत दिए हैं कि यदि उस तारीख तक भी पेशी नहीं होती है तो और कड़े कदम उठाए जा सकते हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह आदेश सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संदेश भी है कि लंबे समय से लंबित मामलों में अदालतें अब सख्त रुख अपना रही हैं।






















