नेपाल आज फिर उसी मोड़ पर खड़ा है, जहां से 2008 में लोकतंत्र की नींव रखी गई थी। सड़कों पर “राजा वापस लाओ” के नारे गूंज रहे हैं, और पूर्व राजा ज्ञानेंद्र सुर्खियों में हैं। मगर, ये आवाजें सिर्फ राजनीतिक उथल-पुथल नहीं, बल्कि एक ऐसी रात की याद दिलाती हैं, जब नेपाल के शाही परिवार का खून बहा था। 1 जून 2001 की वो काली रात, जिसने न केवल राजा-रानी को मौत के घाट उतारा, बल्कि लोकतंत्र और राजतंत्र के बीच एक “खूनी द्वंद्व” छोड़ दिया।
वो रात: जब ‘कहानी’ हकीकत बन गई
“एक था राजा, एक थी रानी… दोनों मर गए, खत्म कहानी…” बचपन की यह कहावत नेपाल में 1 जून 2001 को सच साबित हुई। नारायणहिती राजमहल के बिलियर्ड्स रूम में शाही परिवार का डिनर “खूनी दावत” में तब्दील हो गया। युवराज दीपेंद्र, जो अपनी प्रेमिका देवयानी राणा से शादी को लेकर मां-बाप से उलझ रहे थे, ने जर्मन सबमशीन गन से अपने पिता राजा बीरेंद्र, मां महारानी ऐश्वर्या और सात अन्य शाही सदस्यों को मार डाला। खुद को भी गोली मारकर वह कोमा में चले गए और 54 घंटे बाद “ब्रेन डेड” घोषित हुए।
सवालों के गोलियों से छलनी ‘सच’
- क्या दीपेंद्र अकेले थे? नेपाली जनता आज भी इस थ्योरी पर यकीन नहीं करती। पत्रकार कृष्णा अबिरल के उपन्यास ‘रक्तकुंड’ के अनुसार, दीपेंद्र के वेश में दो नकाबपोश हत्यारे थे।
- ज्ञानेंद्र कहां थे? उस रात राजकुमार ज्ञानेंद्र और उनका बेटा पारस महल में मौजूद थे, लेकिन एक खरोंच तक न आई। क्या यह सिर्फ संयोग था?
- राजनीतिक साजिश? कुछ विश्लेषक मानते हैं कि सेना और राजनीतिक ताकतों ने शाही झगड़े का फायदा उठाया। 2008 में माओवादी सरकार ने जांच का वादा किया, मगर आज तक “फाइलें धूल खा रही हैं।”
‘के गारदेको’… राजा के आखिरी शब्दों का मर्म
ब्रिटिश लेखक जोनाथन ग्रेगसन की किताब ‘मैसेकर ऐट द पैलेस’ के मुताबिक, गोली खाकर गिरते हुए राजा बीरेंद्र ने दीपेंद्र से पूछा: “के गारदेको?” (तुमने क्या कर दिया?)। ये शब्द नेपाल के इतिहास में एक सिसकती सवालिया निशान बन गए।
राजतंत्र की वापसी: क्यों जिंदा हो रहा है 25 साल पुराना घाव?
आज नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और आर्थिक संकट के बीच कई लोगों को लगता है कि “राजा ही देश बचा सकता है।” मगर, शाही हत्याकांड का रहस्य इस आंदोलन की राह में सबसे बड़ी बाधा है। ज्ञानेंद्र के समर्थक कहते हैं: “राजतंत्र स्थिरता लाएगा,” जबकि विरोधी चेतावनी देते हैं: “क्या उसी खूनी खेल को दोहराना चाहते हो?”
क्या कभी खुलेगा रहस्य का पर्दा? नेपाल आज भी उस रात के “खून के धब्बों” से मुक्त नहीं हुआ। जांच की मांग करने वाले कहते हैं: “सच दफनाने से इतिहास नहीं बदलता।” मगर, सत्ता के गलियारों में शायद कोई नहीं चाहता कि सच सामने आए। शाही हत्याकांड की 25वीं बरसी पर एक सवाल फिर गूंज रहा है: “क्या नेपाल को सच चाहिए या सत्ता?”