Somnath Swabhiman Parv: भारत की सनातन परंपरा और सांस्कृतिक आत्मा के प्रतीक सोमनाथ मंदिर को लेकर देशभर में एक बार फिर व्यापक आध्यात्मिक चेतना देखने को मिल रही है। जनवरी 1026 में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पर हुए पहले आक्रमण को एक हजार वर्ष पूरे होने जा रहे हैं और इसी ऐतिहासिक अवसर को ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के रूप में मनाने की तैयारियां तेज हो गई हैं। बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद के अध्यक्ष प्रो. रणबीर नंदन ने स्पष्ट किया है कि इस पर्व के दौरान बिहार के प्रत्येक शिवालय में भगवान शंकर का विशेष अभिषेक और पूजा-अर्चना की जाएगी, ताकि यह आयोजन केवल एक क्षेत्र तक सीमित न रहकर जन-जन की आस्था से जुड़ सके।
प्रो. रणबीर नंदन ने कहा कि सोमनाथ मंदिर का इतिहास केवल विध्वंस और संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक दृढ़ता और पुनर्जागरण का जीवंत उदाहरण है। बार-बार आक्रमणों के बावजूद सोमनाथ न झुका, न टूटा, बल्कि हर बार पहले से अधिक भव्य स्वरूप में खड़ा हुआ। यही कारण है कि आज सोमनाथ को केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान, शौर्य और अखंड आस्था के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2026 सोमनाथ के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। एक ओर 1026 के आक्रमण की सहस्राब्दी पूरी हो रही है, वहीं दूसरी ओर पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के 75 वर्ष भी इसी वर्ष पूरे होंगे। 11 मई 1951 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की उपस्थिति में सोमनाथ मंदिर का पुनः उद्घाटन स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ऐतिहासिक घोषणा थी, जिसने देश को अपनी विरासत पर गर्व करने का नया आत्मविश्वास दिया।
बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद ने इस अवसर को एक व्यापक आध्यात्मिक जन-अभियान का रूप देने का निर्णय लिया है। प्रो. नंदन ने मठों, मंदिरों और धर्मशालाओं के महंथों एवं न्यास पदाधिकारियों से आग्रह किया है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमनाथ में पूजा-अर्चना और दर्शन करें, उसी समय बिहार के सभी शिवालयों में भगवान शिव का अभिषेक और विशेष पूजा संपन्न कराई जाए। उनका मानना है कि इससे बिहार की धरती से भी सोमनाथ स्वाभिमान पर्व की आध्यात्मिक ऊर्जा पूरे देश में प्रवाहित होगी।
प्रो. नंदन ने बिहार और सोमनाथ के बीच ऐतिहासिक संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा कि यह जुड़ाव केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भी है। मधुबनी जिले के सौराठ में स्थित सोमनाथ महादेव मंदिर को लेकर प्रचलित मान्यता है कि 1026 के आक्रमण के बाद सोमनाथ मंदिर के पुजारी गंगा दत्त और भागीरथ दत्त वहां से अवशेष लेकर आए और सौराठ में शिवलिंग की स्थापना की। सौराठ का नाम भी गुजरात के सौराष्ट्र से साम्य रखता है, जो इस गहरे ऐतिहासिक संबंध को और सशक्त करता है।
उन्होंने कहा कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बिहारवासियों के लिए एक पुनीत कर्तव्य है। इस पर्व के माध्यम से सनातन परंपरा, सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय चेतना को नई ऊर्जा देने का प्रयास किया जा रहा है। पर्षद की ओर से स्थानीय मीडिया और सामाजिक माध्यमों के जरिए इस आयोजन को व्यापक रूप से प्रसारित करने की अपील भी की गई है, ताकि समाज का हर वर्ग इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक क्षण से जुड़ सके।
गौरतलब है कि इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 जनवरी को अपने तीन दिवसीय गुजरात दौरे के दौरान सोमनाथ पहुंच रहे हैं। ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के अंतर्गत आयोजित शौर्य यात्रा का नेतृत्व करते हुए प्रधानमंत्री उस हजार वर्षों की आस्था और संघर्ष को नमन करेंगे, जिसने भारतीय संस्कृति को हर दौर में अडिग बनाए रखा।






















