बिहार में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी अभी पूरी तरह ठंडी भी नहीं पड़ी है कि सियासत का केंद्र अब राज्यसभा (Bihar Rajya Sabha Election) की खाली होने वाली सीटों पर आ गया है। अप्रैल 2026 में बिहार से राज्यसभा की पांच सीटें रिक्त होने जा रही हैं और इन्हीं सीटों को लेकर एनडीए खेमे में रणनीतिक हलचल तेज हो चुकी है। सत्ता पक्ष का साफ संदेश है कि इस बार महागठबंधन को कोई मौका नहीं दिया जाएगा और सभी पांचों सीटों पर एनडीए अपना परचम लहराने की कोशिश करेगा।
विधानसभा के मौजूदा अंकगणित पर नजर डालें तो एनडीए की स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए करीब 41 विधायकों का समर्थन जरूरी होता है, लेकिन मौजूदा संख्याबल में महागठबंधन उस स्थिति में नहीं दिख रहा कि वह एक भी सीट सुरक्षित कर सके। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि राज्यसभा चुनाव में भी नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को करारी सियासी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। विधानसभा के बाद राज्यसभा में संभावित हार महागठबंधन के लिए बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका साबित हो सकती है।
एनडीए के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर गहन मंथन जारी है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि जदयू के हिस्से में दो सीटें जा सकती हैं, जबकि भाजपा भी दो सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार सकती है। इसके अलावा एक सीट लोजपा (रामविलास) को दिए जाने की संभावनाएं जताई जा रही हैं। हालांकि, इस समीकरण को अंतिम रूप देने के लिए चिराग पासवान को एनडीए नेतृत्व और सहयोगी दलों के बीच संतुलन साधना होगा।
भाजपा खेमे में राज्यसभा उम्मीदवारों को लेकर चर्चाएं सबसे ज्यादा तेज हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बने नितिन नवीन का राज्यसभा जाना लगभग तय माना जा रहा है। इसके साथ ही भाजपा एक ऐसे चेहरे को दिल्ली भेजने की रणनीति पर भी काम कर रही है, जो राजनीतिक के साथ-साथ सामाजिक समीकरणों को भी साध सके। इसी संदर्भ में भोजपुरी सिनेमा के पावर स्टार और राजनीति में सक्रिय पवन सिंह का नाम जोर-शोर से उभर रहा है। माना जा रहा है कि पवन सिंह को राज्यसभा भेजकर भाजपा पूर्वांचल, युवाओं और भोजपुरी भाषी मतदाताओं को एक बड़ा राजनीतिक संदेश देना चाहती है।
गौरतलब है कि बिहार से राज्यसभा की जिन पांच सीटों का कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को पूरा हो रहा है, उनमें आरजेडी के प्रेम चंद गुप्ता और एडी सिंह, जदयू के हरिवंश नारायण और रामनाथ ठाकुर, साथ ही राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा शामिल हैं। इन नामों के रिटायरमेंट के साथ ही बिहार की सियासत एक बार फिर नए समीकरणों और सत्ता संतुलन की दिशा में बढ़ती नजर आ रही है।






















