लोकसभा में चुनाव सुधारों पर हुई बहस (Lok Sabha Debate) सोमवार को उस समय गर्मा गई, जब जेडीयू के ललन सिंह के विपक्ष पर तीखे हमलों का आरजेडी ने जोरदार जवाब दिया। आरजेडी सांसद अभय कुमार सिन्हा ने सदन में खड़े होकर न केवल कांग्रेस व विपक्ष पर लगाए गए आरोपों को सिरे से खारिज किया, बल्कि एनडीए सरकार के दावों की जड़ें भी हिला दीं। सिन्हा ने तर्क, तथ्यों और व्यंग्य के मिश्रण से सत्ता पक्ष को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि यदि एनडीए को अपनी लोकप्रियता पर सचमुच भरोसा है, तो चुनाव ईवीएम की बजाय बैलट पेपर से कराए जाएं, वास्तविक जनादेश साफ हो जाएगा।
अभय सिन्हा ने एनडीए द्वारा बार-बार विपक्ष को ‘परिवारवाद’ पर घेरने के प्रयास को पलटते हुए खुद सत्ता गठबंधन को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि हाल के चुनावों में टिकट बंटवारे की जो तस्वीर सामने आई, वह बताती है कि रिश्तेदारी और पारिवारिक समीकरण एनडीए के भीतर किस हद तक प्रभावी हैं। उन्होंने कटाक्ष किया कि कहीं पति-पत्नी को टिकट दिया गया, तो कहीं ससुर–बहू को उम्मीदवार बनाया गया। किसी जगह मामा-भांजे की सेटिंग चलती रही, तो किसी सीट पर समधी–समधन को मौका मिला। उन्होंने यह भी पूछा कि आखिर बिना किसी सदन का सदस्य बने मंत्री पद की शपथ दिलाना कौन सी लोकतांत्रिक मर्यादा का हिस्सा है?
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बिहार में ‘जंगलराज’ के राजनीतिक नारे को भी आरजेडी सांसद ने कठोर शब्दों में लताड़ा। उन्होंने याद दिलाया कि एनडीए पिछले दो दशकों से राज्य की सत्ता संभाल रहा है। ऐसे में यदि 20 साल के शासन के बाद भी वही पुराना ‘जंगलराज’ का राग अलापा जा रहा है तो यह सीधे-सीधे सरकार की नाकामी स्वीकार करने जैसा है। विपक्ष के अतीत को कोसने की बजाय, सत्ता पक्ष को अपनी कमियों का ईमानदारी से मूल्यांकन करना चाहिए।
अभय सिन्हा ने समस्तीपुर में मिली लावारिस वीवीपैट पर्चियों का मामला उठाकर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने कहा कि आयोग ने भले ही इसे ‘मॉक पोल की पर्चियां’ बताया हो, लेकिन जब कोई गड़बड़ी नहीं थी तो फिर संबंधित अधिकारियों को सस्पेंड क्यों किया गया? यह कार्रवाई खुद इस बात का संकेत है कि मामला उतना साधारण नहीं था जितना बताया जा रहा है।
इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आचार संहिता के कथित उल्लंघन का अत्यंत गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि 6 अक्टूबर को आचार संहिता लागू हो चुकी थी, फिर भी चुनाव प्रक्रिया के बीच महिलाओं के खातों में 10-10 हजार रुपये भेजना क्या सरकारी तंत्र द्वारा वोट प्रभावित करने की कोशिश नहीं थी? उन्होंने प्रश्न उठाया कि चुनाव आयोग ने इस पर क्या कार्रवाई की और क्या उसे ऐसा करने से रोका गया? उन्होंने यह भी कहा कि आशा कार्यकर्ताओं पर दबाव बनाकर उन्हें एक विशेष दल के समर्थन के लिए मजबूर किया गया, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ एक बड़ा खिलवाड़ है।






















