Priyanka Gandhi: संसद के शीतकालीन सत्र के समापन के बाद हुई पारंपरिक ‘चाय पे चर्चा’ इस बार सामान्य औपचारिकता से कहीं आगे निकल गई। वजह बनीं पहली बार लोकसभा पहुंचीं प्रियंका गांधी वाड्रा, जिनकी मौजूदगी और बैठने की जगह ने कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में चल रहे मंथन को सतह पर ला दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा अध्यक्ष के साथ अग्रिम पंक्ति में बैठकर चाय पीती प्रियंका गांधी का दृश्य राजनीतिक संकेतों से भरा माना जा रहा है।
कांग्रेस के भीतर यह सवाल अब खुलकर पूछा जाने लगा है कि क्या प्रियंका गांधी की यह सहज, संवादपरक और समावेशी राजनीति राहुल गांधी की आक्रामक रणनीति के समानांतर एक नया पावर सेंटर तैयार कर रही है। खास बात यह है कि प्रियंका फिलहाल संसदीय दल में किसी औपचारिक पद पर नहीं हैं, इसके बावजूद उन्हें जो महत्व मिला, उसने कई वरिष्ठ नेताओं को भी सोचने पर मजबूर कर दिया।
सूत्रों के मुताबिक, चाय के दौरान प्रधानमंत्री और प्रियंका गांधी के बीच उनके संसदीय क्षेत्र वायनाड को लेकर शालीन बातचीत हुई। राजनीति में जहां अक्सर तीखे बयान और कटाक्ष सुर्खियां बनते हैं, वहीं प्रियंका का यह संवाद आधारित तरीका उन्हें अलग पहचान देता है। यही वजह है कि जानकार उनके राजनीतिक स्वभाव की तुलना सोनिया गांधी से कर रहे हैं, जो मतभेदों को सार्वजनिक टकराव बनने से पहले ही साध लेने के लिए जानी जाती रही हैं।
इस सत्र में राहुल गांधी की सीमित मौजूदगी के बीच प्रियंका गांधी संसद में कांग्रेस की सक्रिय आवाज बनकर उभरीं। वह नियमित रूप से समय से संसद पहुंचीं, मीडिया से संवाद किया और यह संदेश देने में सफल रहीं कि विपक्ष कमजोर या बिखरा हुआ नहीं है। इससे एक दिन पहले लोकसभा में नितिन गडकरी से वायनाड के हाईवे को लेकर हल्के अंदाज में की गई उनकी बातचीत भी काफी चर्चा में रही, जिसे गडकरी ने सकारात्मक रूप से लेते हुए उन्हें कार्यालय आने का न्योता दे दिया।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि प्रियंका गांधी इस सत्र में सिर्फ दिखने तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने कांग्रेस के भीतर ‘बिग टेंट’ यानी सभी धाराओं को साथ लेकर चलने की कोशिश की। मनीष तिवारी और शशि थरूर जैसे नेताओं को प्रमुख बहसों में आगे लाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इन नेताओं की मुखर मौजूदगी ने सदन में कांग्रेस की धार को फिर से तेज किया, जिसे पिछले कुछ समय से कमजोर माना जा रहा था।
लोकसभा के भीतर प्रियंका गांधी ने टकराव से बचने के बजाय संतुलित आक्रामकता का रास्ता चुना। ‘वंदे मातरम्’ जैसे संवेदनशील मुद्दे पर प्रधानमंत्री को सीधे घेरना और वह भी संयम व हल्के हास्य के साथ, उनके आत्मविश्वास और राजनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है। यह ऐसा क्षेत्र था, जहां कांग्रेस के कई नेता अब तक सावधानी बरतते रहे हैं।
बीजेपी के रणनीतिक हलकों में भी यह आकलन बनने लगा है कि प्रियंका गांधी को हल्के में लेना आसान नहीं होगा। जहां राहुल गांधी पर सीधा हमला करना सत्तापक्ष के लिए अपेक्षाकृत सरल रहा है, वहीं प्रियंका संवाद, संतुलन और रिश्तों के जरिए राजनीति करने वाली नेता के रूप में देखी जा रही हैं। यही वजह है कि उनके और प्रशांत किशोर के बीच संभावित संवाद को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं।
सत्र के खत्म होते-होते कांग्रेस में दो शक्ति केंद्रों की बहस और तेज हो गई है। संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले समय में राहुल गांधी वैचारिक संघर्ष और जनआंदोलनों का चेहरा बने रह सकते हैं, जबकि संसद और संगठन के भीतर रणनीति, संवाद और प्रबंधन की कमान प्रियंका गांधी के हाथों में आ सकती है। सवाल यही है कि यह संतुलन कांग्रेस को मजबूती देगा या अंदरूनी सियासत को नई दिशा में ले जाएगा।






















