संसद के शीतकालीन सत्र के छठे दिन सोमवार को लोकसभा में वंदे मातरम् के 150 वर्ष (Vande Mataram 150 Years) पूरे होने पर चर्चा की जानी है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस चर्चा की शुरुआत की करेंगे। वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर संसद में होने वाली चर्चा को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच बहस और सवाल खड़े हो रहे हैं।
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने संसद में कहा कि वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होना सिर्फ अतीत का उत्सव नहीं है, बल्कि आने वाले 150 वर्षों के लिए मजबूत नींव रखने का अवसर भी है। उनके अनुसार, यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों के भीतर देशभक्ति की भावना जगाने वाला मूल स्रोत रहा है और आज की युवा पीढ़ी के लिए इसका अर्थ और भी गहराई से समझना जरूरी है। चिराग पासवान ने इस चर्चा को समय की मांग बताते हुए कहा कि राष्ट्र के मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए ऐसी बहस आवश्यक है।
भाजपा नेता अजय आलोक ने इस चर्चा को ऐतिहासिक बताते हुए सवाल उठाया कि आखिर 150 साल बाद ही वंदे मातरम् पर संसद में विशेष चर्चा क्यों हो रही है। उन्होंने कहा कि जब यह गीत 50 या 100 वर्ष का हुआ, तब इस पर उसी गंभीरता से विमर्श क्यों नहीं हुआ। अजय आलोक ने आरोप लगाया कि एक सुनियोजित तरीके से वंदे मातरम् को हाशिए पर डालने और अपमानित करने की कोशिशें की गईं, जिस पर खुलकर चर्चा होना जरूरी है। उनका मानना है कि संसद में हो रही यह बहस वर्तमान के साथ-साथ भावी पीढ़ियों, विशेषकर Gen-Z, के लिए वंदे मातरम् के इतिहास और महत्व को समझने का अवसर बनेगी।
वहीं, राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने इस बहस को आत्ममंथन से जोड़ते हुए कहा कि किसी भी ऐतिहासिक अवसर पर सिर्फ अतीत को याद करना पर्याप्त नहीं होता। उन्होंने सवाल किया कि वंदे मातरम् में निहित राष्ट्रवाद आज किस रूप में मौजूद है। क्या वह समावेशी राष्ट्रवाद है या फिर बहिष्कार की ओर बढ़ता राष्ट्रवाद? मनोज झा के अनुसार, इस तरह की चर्चाएं हमें यह सोचने का मौका देती हैं कि क्या हम वर्तमान चुनौतियों का सामना उसी व्यापक सोच के साथ कर पा रहे हैं, जैसा स्वतंत्रता आंदोलन के समय था।
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने वंदे मातरम् को स्वतंत्रता संग्राम के केंद्र में रखते हुए कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ी गई आज़ादी की लड़ाई में वंदे मातरम् प्रेरणास्रोत और मूलमंत्र रहा है। साथ ही उन्होंने भाजपा के मातृ संगठनों पर उस दौर में अंग्रेज़ों के साथ खड़े रहने का आरोप लगाते हुए कहा कि अगर आज वंदे मातरम् की भूमिका को ईमानदारी से स्वीकार किया जाए, तो इतिहास के कुछ दाग शायद धुल सकें।
शिवसेना (UBT) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने सरकार पर दोहरे मापदंडों का आरोप लगाते हुए कहा कि वंदे मातरम् और जय हिंद जैसे नारे भारत की संस्कृति और आज़ादी की लड़ाई से जुड़े हुए हैं। उन्होंने याद दिलाया कि जिस सरकार ने राज्यसभा में एक नोटिफिकेशन के जरिए इन नारों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई थी, वही अब इन्हीं पर चर्चा कर रही है, जो विरोधाभासी लगता है। प्रियंका चतुर्वेदी ने उम्मीद जताई कि यह बहस किसी चुनावी एजेंडे, खासकर पश्चिम बंगाल चुनाव, से प्रेरित न हो और राजनीति से ऊपर उठकर देशहित में हो।






















